शुध्द धन के द्वारा सज्जनों की भी संपत्तियों विशेष नहीं बढती हैं.ठीक हैं
नदियाँ शुध्द जल से कभी भी परिपूर्ण नहीं होती हैं.जिस प्रकार नदियाँ कभी
आकाश से बरसते हुए शुध्द जल से परिपूर्ण नहीं होती हैं.किन्तु वे इधर उधर
की गन्दी नालियों आदि के बहते हुए जल से ही परिपूर्ण होती हैं: उसी प्रकार
संपत्तियों भी कभी किसी के न्यायोपार्जित धन के द्वारा नहीं बढती हैं:
किन्तु असत्य भाषण , मायाचार एवं चोरी आदि के द्वारा अन्य प्राणियों को
पीड़ित करने पर ही वृध्धि को प्राप्त होती हुई देखीजाती हैं. इससे यह सूचित
किया गया हैं कि जो सज्जन मनुष्य यह सोचते हैं कि न्याय मार्ग से धन
सम्पत्तिको बड़ाकर उससे सुख का अनुभव करेंगे उनका वह विचार योग्य नहीं हैं.
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